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क्या मुसलमान औरतों का पर्दा खुद मुसलमानों की नाकामी है ? | Sunni Muslim

इस्लाम में पर्दा को लेकर आज कल बहुत सी गढ़ी हुई बाते, बेबुनियाद दावे, और तरह तरह के झूठ फैलाए जाते है
जो कहते तो है की वो “मुसलमान औरतो के इन्साफ की बात कर रहे है” जबकि हक़ीक़तन उनका मकसद इस्लाम को बदनाम करना ही होता है
 

आजकल पर्दा को लेकर एक और ऐतराज़ खूब चर्चा में बना हुआ है…




ए़तराज : औरत का पर्दा करना इस बात की गवाही देता है कि मज़हब मर्द की तरबियत (Training) करने में नाकाम रहा है।


जवाब: इस्लाम में सबसे पहले मर्दों को यह हुक्म दिया गया है कि वे अपनी नज़रें नीची रखें। इससे साफ होता है कि सुधार (Reform) और तरबियत (Training) की शुरुआत मर्द से की गई है। लेकिन यहाँ एक अहम सवाल पैदा होता है कि क्या सिर्फ मर्द की सुधार काफी है? अगर ऐसा होता, तो दुनिया के वो समाज जहाँ बहुत ज़्यादा आज़ादी (Freedom) है, वहाँ Harassment, rape और दूसरे Crimes खत्म हो जाने चाहिए थे, लेकिन हकीकत इसके उलट है।


इसी संदर्भ (Context) में पर्दे के Concept को समझना ज़रूरी है। पर्दे को अक्सर एक पाबंदी (Restriction) समझा जाता है, जबकि असल में यह एक Preventive System (एहतियाती और सुरक्षा का तरीका) है। जैसे हम अपने घर को चोरी से बचाने के लिए दरवाज़े पर ताला लगाते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि समाज चोरों की Training में नाकाम हो गया है, बल्कि यह एक Safety Measure है। इसी तरह जब हम Traffic Rules बनाते हैं, तो इसका मकसद लोगों को रोकना नहीं बल्कि Accidents से बचाना होता है।


बिलकुल इसी तरह पर्दा भी Social Protection (समाज की सुरक्षा) का एक हिस्सा है। इसका मकसद किसी एक को दोष देना नहीं, बल्कि एक Balanced और Safe Society बनाना है, जहाँ मर्द और औरत दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझकर ज़िंदगी गुज़ारें।


उम्मीद करते है “इस ऐतराज़ का मुकम्मल जवाब आपको मिल गया होगा” आइन्दा अगर कोई इस तरह की फ़िज़ूल बाते करता है तो आपके पास उसे देने के लिए माकूल जवाब होगा!


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