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क़ुरआन मजीद अरबी भाषा में ही क्यों नाज़िल हुआ?

क़ुरआन मजीद के बारे में अक्सर एक सवाल या एतराज़ उठाया जाता है कि अगर यह किताब पूरी इंसानियत की हिदायत के लिए है, तो फिर यह सिर्फ़ अरबी भाषा में ही क्यों नाज़िल हुई? दुनिया में तो हज़ारों भाषाएँ मौजूद हैं। क्या हर इंसान के लिए उसकी अपनी भाषा में किताब नहीं होनी चाहिए?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए क़ुरआन की हिकमत, अल्लाह के तरीके और इंसानी समाज की वास्तविकताओं को समझना ज़रूरी है।


एतराज़

अगर क़ुरआन पूरी इंसानियत की हिदायत के लिए है तो वह सिर्फ़ अरबी भाषा में ही क्यों उतारा गया? दुनिया में तो हज़ारों भाषाएँ हैं।


अल्लाह का तरीका: हर रसूल अपनी क़ौम की भाषा में

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि अल्लाह तआला का तरीका यह रहा है कि हर रसूल को उसकी क़ौम की भाषा में भेजा गया, ताकि पैग़ाम पूरी तरह साफ़ तौर पर पहुँच सके। क़ुरआन खुद ऐलान करता है:

“وَمَا أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ”

(Ibrahim: 4)

चूँकि नबी करीम ﷺ अरब थे और पहली मुख़ातिब क़ौम अरब थी, इसलिए क़ुरआन अरबी में नाज़िल हुआ। यह कोई अपवाद नहीं बल्कि अल्लाह का स्थापित तरीका है।


एक ही मूल भाषा होने की अक़्ली हिकमत

दूसरी बात अक़्ली (Logical) है। अगर क़ुरआन हर भाषा में नाज़िल होता तो सवाल पैदा होता कि कितनी भाषाओं में?

आज दुनिया में हज़ारों भाषाएँ हैं। क्या हर क़ौम के लिए अलग वही (Divine Revelation) आती? अगर कई असली नुस्ख़े होते तो मतभेद कैसे खत्म होते?

हिकमत (Wisdom) का तकाज़ा यही था कि असल किताब एक ही भाषा में हो और बाकी भाषाओं में उसके तरजुमा (Translation) हों। दुनिया में हर अहम दस्तावेज़ का एक असली पाठ होता है, अनुवाद उसकी समझ के लिए होते हैं। क़ुरआन का मामला भी ऐसा ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि क़ुरआन अल्लाह का सुरक्षित कलाम है।


एक अमली मिसाल: इल्म की मूल भाषा

इस बात को एक आसान उदाहरण से समझिए।

आज साइंस, तिब्ब (Medical) और टेक्नोलॉजी की ज़्यादातर बुनियादी किताबें अंग्रेज़ी में होती हैं, लेकिन दुनिया भर के लोग उन्हें अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद करके पढ़ते हैं।

कोई यह आपत्ति नहीं करता कि यह इल्म पूरी दुनिया के लिए है तो हर भाषा में मूल किताब क्यों नहीं लिखी गई। असल भाषा एक होती है और समझने के लिए अनुवाद होते हैं।


अरबी भाषा की विशेषताएँ

एक और अहम बात यह है कि अरबी भाषा अपनी वुसअत (Breadth), दिक़्क़त (Precision) और मअनी-खेज़ी (Depth of Meaning) के लिहाज़ से बहुत समृद्ध भाषा है।

इस भाषा में एक शब्द कई गहरे अर्थ अपने अंदर समेट सकता है। कानून, नैतिकता और ईश्वरीय हिदायत जैसे व्यापक पैग़ाम के लिए यह भाषा बहुत उपयुक्त थी। क़ुरआन भी इस हक़ीक़त की तरफ इशारा करता है:

“إِنَّا أَنزَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ”

(Yusuf: 2)


अगर क़ुरआन गैर-अरबी होता तो?

क़ुरआन खुद इस एतराज़ का जवाब देता है:

“وَلَوْ جَعْلْنَاهُ قُرْآنًا أَعْجَمِيًّا لَّقَالُوا لَوْلَا فُصِّلَتْ آيَاتُهُ”

(Fussilat: 44)

यानी अगर क़ुरआन गैर-अरबी भाषा में होता तो यही लोग कहते कि यह हमारी भाषा में क्यों नहीं है।

इससे मालूम हुआ कि असल आपत्ति भाषा नहीं बल्कि मानने से बचना है।

आज क़ुरआन का पैग़ाम पूरी दुनिया तक

आख़िर में यह बात सामने रहे कि क़ुरआन भले ही अरबी में नाज़िल हुआ हो, लेकिन आज दुनिया की लगभग हर बड़ी भाषा में उसके अनुवाद मौजूद हैं।

कोई भी व्यक्ति अपनी भाषा में क़ुरआन का पैग़ाम समझ सकता है। इस तरह क़ुरआन अरबी में नाज़िल होकर भी पूरी इंसानियत तक पहुँच रहा है।


निष्कर्ष

क़ुरआन का अरबी में नाज़िल होना उसके वैश्विक संदेश के खिलाफ़ नहीं, बल्कि पूरी हिकमत (Wisdom), फ़ितरत (Natural Order) और ज़रूरत के मुताबिक है।

असल किताब का एक भाषा में होना ज़रूरी था, जबकि उसकी हिदायत को हर भाषा तक पहुँचाना उम्मत की ज़िम्मेदारी है और यह काम काफ़ी हद तक हो भी चुका है।

अगर नीयत में सच्चाई हो और इंसान सच की तलाश करे तो उसे सिरात-ए-मुस्तक़ीम (Straight Path) मिल ही जाता है। लेकिन अगर मक़सद सिर्फ़ इस्लाम पर उंगली उठाना और नुक्ताचीनी करना हो तो याद रखो कि अल्लाह ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता।

✍️ — मुहम्मद फ़ैयाज़ मिस्बाही

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