फातिहा दरअसल है क्या?
इस्लाम में मरहूमीन के लिए दुआ करना और उनके लिए मग़फ़िरत माँगना एक बहुत बड़ा नेक अमल है। जिसे फातिहा कहा जाता है | कब्रिस्तान जाकर फातिहा पढ़ना, क़ुरआन की तिलावत करना और सवाब बख़्शना अहले-सुन्नत वल-जमाअत के नज़दीक आम और जायज़ अमल है।
लेकिन अक्सर लोगों के दिमाग में सवाल रहता है कि “कब्र पर फातिहा पढ़ने का सही तरीका क्या है?”
आज हम आपको शरीअत के मुताबिक़,अहले सुन्नत का सही तरीका आसान लहज़े में बता रहे हैं।
सबसे पहले कब्रिस्तान में दाख़िल होने का सही तरीका
कब्रिस्तान में दाख़िल होते वक़्त सलाम कहना सुन्नत है। आप इस तरह सलाम कह सकते हैं:
“अस्सलामु अलैकुम या अहलल क़ुबूर, यग़फिरुल्लाहु लना वलकुम।”
तर्जुमा : ऐ क़ब्रों वालों! तुम पर सलाम हो, अल्लाह हमारी और तुम्हारी मग़फ़िरत फ़रमाए।
कब्र के पास खड़े होने का सही तरीका (Ahle Sunnat)
कब्र के पास अदब के साथ खड़े हों, बेहतर होगा कि आप मरहूम के पाँव की तरफ़ जाकर खड़े हों।
हालाँकि मुँह कब्र की तरफ़ रखना मुनासिब है, लेकिन यह कोई सख़्त शर्त नहीं। यहाँ सबसे अहम बात ये है कि दिल में इख़लास और तवाज़ु हो।
कब्र पर फातिहा पढ़ने का तरीका (Step-by-Step)
सबसे पहले तीन बार दुरूद शरीफ पढ़ें
अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्यिदीना व मौलाना मुहम्मदीन वा बारिक वसल्लिम
अब तीन बार सूरह इख़लास पढ़ें
बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम क़ुल हुवल्लाहु अहद अल्लाहुस्समद लम यलिद व् लम यूलद वलम य कुल्लहू कुफुवन अहद
अब एक बार सुरह फातिहा पढ़ें |
बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम अल्हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन !अर्रहमा निर्रहीम ! मालिकि यौमिद्दीन ! इय्याका न अ बु दु व इय्याका नस्तईन ! इह दि नस सिरातल मुस्तक़ीमा ! सिरातल लज़ीना अन अम्ता अलै हिम गैरिल मगदूबी अलै हिम वलद्दाल्लीन (आमीन)
अब इस तरह इसाले सवाब करें
तिलावत के बाद कहें:
या अल्लाह! हमने जो ये क़ुरआन की तिलावत की है, जो सूरह फ़ातिहा और दरूद शरीफ़ पढ़ा है, उस तमाम नेक अमल का सवाब अपने हबीब, रहमत-ए-आलम ﷺ के वसीले और सदक़े में इस मरहूम / मरहूमा (यहाँ नाम लें) को अता फ़रमा।
ऐ रहमान व रहीम अल्लाह! उनकी तमाम ज़ाहिरी और बातिनी ख़ताओं को माफ़ फ़रमा, उनकी क़ब्र को नूर से भर दे, क़ब्र की तंगी, सख़्ती और अज़ाब से उनकी हिफ़ाज़त फ़रमा।
या अल्लाह! उनकी क़ब्र को जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ बना दे, और क़ियामत के दिन उन्हें रसूल-ए-अकरम ﷺ की शफ़ाअत नसीब फ़रमा।
ऐ अल्लाह! उन्हें जन्नत-उल-फ़िरदौस में आला से आला मुक़ाम अता फ़रमा, अपने नेक बंदों और सालेहीन के साथ उनका हश्र फ़रमा, और हमें भी उनके नक़्श-ए-क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा।
आमीन या रब्बल आलमीन।
कब्र पर फातिहा पढ़ते वक़्त इन बातों का ख्याल रखें
जब आप कब्रिस्तान जाएँ तो कब्रों के आदाब का ख़ास ख्याल रखें, कब्र पर चलना, उसपर पाँव रखना उसे रौंदना या कब्र पर बैठना ये सब इस्लाम में सख्त मना है |
कब्र पर अगरबत्ती,मोमबत्ती या चराग जैसी चीज़ जलाना जायज़ नहीं है |
कब्र पर फूल या खजूर की टहनी रखना यहाँ "खजूर की हरी टहनी का ज़िक्र हदीस में मिलता है (एक ख़ास मौके पर)" लेकिन आम फूल डालना ना ही सवाब है न हि गुनाह, लेकिन इसे इबादत और ज़रूरी समझना सही नहीं है |
कई लोग कब्र पर पानी डालते है | अगर आप इस नियत से पानी डाल रहे है ताकि कब्र की मिट्टी बैठ जाए तो ये जायज़ है लेकिन अगर आपकी नियत ये है की आपके इस अमल से “मरहूम को सुकून मिलेगा” तो ये सही नहीं है |
FAQ: कब्रिस्तान पर फातिहा के ताल्लुक से कुछ ज़रूरी सवाल
सवाल 1: क्या कब्र पर फातिहा पढ़ना बिदअत है?
जवाब: नहीं। क़ुरआन पढ़कर सवाब बख़्शना अहले-सुन्नत के नज़दीक जायज़ और मुस्तहब है।
सवाल 2: क्या सिर्फ़ सूरह फ़ातिहा ही पढ़नी चाहिए?
जवाब: नहीं। क़ुरआन की कोई भी सूरह पढ़ सकते हैं।
सवाल 3: क्या घर से भी इसाले सवाब किया जा सकता है?
जवाब: हाँ। अल्लाह हर जगह सुनने वाला है।
नतीजा (Conclusion)
कब्र पर फातिहा पढ़ना दिखावे या रस्म के लिए नहीं, बल्कि मरहूम के लिए रहमत, मग़फ़िरत और दुआ का ज़रिया है।
ये तरीका अहले-सुन्नत वल-जमाअत के उलेमा के नज़दीक सबसे आम और जायज़ माना जाता है, बशर्ते इसमें दिखावा और ग़लत अकीदों से बचा जाए
सही नीयत, इख़लास और अदब के साथ किया गया अमल ही अल्लाह के यहाँ क़बूल होता है।
0 Comments