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तरावीह की दुआ हिंदी में | Taravih Ki Dua in Hindi

 

तरावीह की नमाज़ क्या है?


तरावीह की नमाज़ रमज़ान के मुक़द्दस महीने में ईशा की नमाज़ के बाद पढ़ी जाती है। यह एक सुन्नत-ए-मुअक्कदा नमाज़ है, तरावीह आम तौर पर दो-दो रकअत करके पढ़ी जाती है और हर चार रकअत के बाद थोड़ी देर बैठकर आराम किया जाता है, जिसे तरवीहा कहा जाता है।


तरावीह की दुआ (Taravih Ki Dua)


सुब्हान जिल मुल्कि वल मलकूत,

सुब्हान जिल इज़्ज़ति वल अज़मति वल हैबति वल कुदरति वल किब्रियाई वल जबरूत,

सुब्हानल मलिकिल हय्यिल लज़ी ला यनामु वला यमूत,

सुब्बूहुन कुद्दूसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति व रूह,

अल्लाह अज़िरना मिनन्नारि या मुजीरु या मुजीरु या मुजीर।


तरावीह की दुआ का हिंदी तर्जुमा / Taraweeh dua with Hindi meaning


सुब्हान जिल मुल्कि वल मलकूत

→ पाक है वो अल्लाह जो ज़मीन और आसमान की बादशाही वाला है।


सुब्हान जिल इज़्ज़ति वल अज़मति वल हैबति वल कुदरति वल किब्रियाई वल जबरूत

→ पाक है वो अल्लाह जो इज़्ज़त, अज़मत, हैबत, क़ुदरत, बड़ाई और ताक़त वाला है।


सुब्हानल मलिकिल हय्यिल लज़ी ला यनामु वला यमूत

→ पाक है वो बादशाह जो हमेशा ज़िंदा है, जिसे न नींद आती है और न मौत।


सुब्बूहुन कुद्दूसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति व रूह

→ वो बेहद पाक और मुक़द्दस है, हमारा रब और फ़रिश्तों और रूह (हज़रत जिब्रील) का रब।


अल्लाह अज़िरना मिनन्नारि या मुजीरु या मुजीरु या मुजीर

→ ऐ अल्लाह! हमें जहन्नम की आग से पनाह दे, ऐ पनाह देने वाले, ऐ पनाह देने वाले, ऐ पनाह देने वाले।


तरावीह में दुआ पढ़ने का तरीका


तरावीह की नमाज़ दो-दो रकात करके अदा की जाती है।


हर चार रकअत पूरी होने के बाद बैठना मुस्तहब (पसंदीदा अमल) है।


इस दौरान तस्बीह, तहलील, दुरूद शरीफ़ या कोई भी दुआ पढ़ी जा सकती है।


इसी मौके पर ये मशहूर तरावीह की दुआ पढ़ी जाती है।


आम तौर पर इसे एक बार या तीन बार पढ़ा जाता है।


क्या तरावीह की दुआ पढ़ना ज़रूरी है?


नहीं, ये दुआ पढ़ना फ़र्ज़ या वाजिब नहीं है। ये एक मुस्तहब अमल है, यानी पढ़ना सवाब का काम है और न पढ़ने पर कोई गुनाह नहीं।


तरावीह की दुआ का फ़ायदा


अल्लाह की अज़मत और क़ुदरत का एहसास बढ़ता है।


दिल में आज़िज़ी और बंदगी की चाहत पैदा होती है।


जहन्नम से पनाह की दुआ रमज़ान की रूह को मज़बूत करती है।


नतीजा (Conclusion)


तरावीह की ये दुआ रमज़ान की नमाज़ को और भी असरदार बना देती है। अगर इसे समझकर, दिल से पढ़ा जाए तो इबादत में ख़ुशू और ख़ुज़ू पैदा होता है | ये दुआ हमें अल्लाह की रहमत और जहन्नम से निजात की याद दिलाती है।


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